Pages

Tuesday, October 26, 2010

मोटोरोला के शानदार एंड्रॉयड मोबाइल फोन

मोटोरोला के शानदार एंड्रॉयड मोबाइल फोन:-
तकनीकी जगत की हर बड़ी से बड़ी मोबाइल निर्माता कंपनी गूगल के एंड्रॉयड सॉफ्टवेयर पर चलने वाले मोबाइल फोन पेश करने में लगी है। ऐसे में तकनीकी बाजार में मोबाइल जगत की जानी-मानी अमेरिकी कंपनी मोटोरोला ने एंड्रॉयड सुविधा वाले मोबाइल फोन की बारिश कर दी है। 
कंपनी ने हाल ही में एंड्रॉयड प्लेटफॉर्म पर चलने वाला मोबाइल फोन ‘फ्लिप आउट’ पेश किया। ये वर्गाकार फोन एक स्लाइडिंग फोन है जिसे चारों और आसानी से घूमाया भी जा सकता है। 2.8 इंच का टचस्क्रीन डिसप्ले वाला ये फोन एक क्वार्टी कीपैड वाला फोन है। 3जी सुविधा वाले इस फोन में 3 मेगापिक्सल कैमरा और माइक्रो एसडी कार्ड के साथ कई आकर्षक सुविधाएं हैं।

ब्लैकबेरी का नया स्मार्टफोन ‘स्टाइल-9670’
 

कारोबारी मोबाइल फोन की दौड़ में सबसे आगे रहने वाली कनाडा की ब्लैकबेरी फोन बनाने वाली मशहूर मोबाइल निर्माता कंपनी रिसर्च इन मोशन (रिम) ला रही है बेहद ही आकर्षक दिखने वाला नया ब्लैकबेरी फोन ‘ब्लैकबेरी स्टाइल-9670’। ये स्मार्टफोन एक फ्लिप फोन है जिसमें क्वार्टी कीबोर्ड की सुविधा दी गई है। ये फोन एक जीएसएम फोन नहीं है इसलिए ये जीएसएम नेटवर्क वालों के लिए बिल्कुल उपयोगी नहीं हैं। 3जी सुविधा से युक्त यह फोन महज 131 ग्राम का है।ब्लैकबेरी की इस नई पेशकश ‘स्टाइल-9670’ की सबसे बड़ी खासियत है इसमें लगी दो-दो डिसप्ले स्क्रीन। जैसा कि ये एक फ्लिप फोन है इसलिए इसमें बाहर भी एक डिसप्ले स्क्रीन है और अंदर भी। बाहर लगी स्क्रीन में आप समय, जरूरी सूचनाएं और एसएमएस देख सकते हैं।

नए ऑपरेटिंग सिस्टम के साथ

 ‘ब्लैकबेरी स्टाइल-9670’ ब्लैकबेरी के नए ऑपरेटिंग सिस्टम 6 पर चलेगा। ये एक सीडीएमए फोन है। 31 अक्टूबर को यह फोन अमेरिका में मिलना शुरू हो जाएगा।इस फोन में फ्लैश के साथ 5 मेगापिक्सल कैमरा है जो कि वीडियो रिकॉर्डिंग में भी मदद करता है। ब्लैकबेरी फोन की खासियत होती है उस पर की जाने वाली नेट सर्फिंग। इस फोन में कैमरे की मदद से फोटो खींचकर आप तुरंत नेट पर अपलोड कर सकेंगे।कनेक्टिविटी के लिहाज से इसमें वाई-फाई की सुविधा है साथ ही इसमें जीपीएस की भी सुविधा है जिसकी मदद से आप किसी भी जगह का नक्शा आसानी से पता लगा सकेंगे। साथ ही ब्लूटूथ, यूएसबी बोर्ड जैसी सुविधाएं हैं। इसके अलावा वेब ब्राउजिंग के लिए पुश ई-मेल और एचटीएमएल की भी सुविधा है।ब्लैकबेरी के इस स्मार्टफोन में बेजोड़ मेमोरी क्षमता है। इसमें 512 एमबी की इंटरनल मेमोरी क्षमता है जिसे 32 जीबी तक बढ़ाया जा सकता है। साथ ही इसमें 16 जीबी का माइक्रो एसडी कार्ड भी है। इसका टॉक टाइम करीब 4 घंटे 30 मिनिट है।


दुनिया की सबसे बड़ी चॉकलेट!


क्‍या आप एक चॉकलेट बार को पूरे मोहल्‍ले में बांट सकते हैं, नहीं ना। लेकिन अब ये संभव हो सकता है। जी हां, अर्मेनिया की राजधानी येरेवान में दुनिया की सबसे बड़ी ऐसी चॉकलेट तैयार हुई है। इस चॉकलेट बार का वजन 9702 पौंड यानी कि 4410 किलोग्राम है। इस विशालकाय चॉकलेट को 'गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड' में शामिल किया गया है। इस चॉकलेट का आकार 224 इंच लंबा, 110 इंच चौड़ा और 10 इंच मोटा है। जिसे ग्रैंड कैंडी फैक्ट्री तैयार ने की है। इस विशालकाय चॉकलेट में 70 प्रतिशत कोकोया के अलावा प्राकृतिक पदार्थों को शामिल किया गया है। फैक्ट्री के मालिक केरेन वरडान्यन ने बताया कि चॉकलेट 16 अक्टूबर तक लोगों के बीच बांटा जा सकेगा।

Monday, October 25, 2010

आईफोन और आईपैड का मिश्रण है ‘मैकबुक एयर’

आईफोन और आईपैड का मिश्रण है ‘मैकबुक एयर’


जहां तकनीकी कंपनियां धड़ाधड़ टैबलेट कम्प्यूटर पेश करने में लगी हैं वहीं कैलिफॉर्निया की दिग्गज कंपनी एप्पल ने पेश किया अब तक का सबसे पतला और सबसे हल्का लैपटॉप ‘मैकबुक एयर-3.1’। दरअसल ये एक नोटबुक है जो एप्पल के ही ऑपरेटिंग सिस्टम ‘मैक ओएक्स’ पर काम करेगी। ये नोटबुक आईपैड और आईफोन का मिश्रण कही जा सकती है। एप्पल का मैकबुक एयर दो आकार में उपलब्ध रहेगा। 11 इंच की स्क्रीन वाले मैकबुक एयर की कीमत करीब 70 हजार रुपए हैं वहीं 13 इंच की स्क्रीन वाले दूसरे लैपटॉप की कीमत करीब 99 हजार रुपए रहेगी। दोनों ही अलग-अलग मेमोरी क्षमता में मिलेंगे जैसा कि एप्पल के उत्पाद मिलते हैं। 

और भी जगाहे है यह भी देखो..

वैसे हममें से अधिकांश के लिए गूगल वेब सर्च का पर्याय बन चुका है। हम गूगल पर सूचना के लिए जाते हैं। इसका मतलब कि हम सूचना प्राप्ति के लिए किसी अधिक भरोसेमंद और तेज साधनों का इस्तेमाल नहीं करते।
पिक्चर परफेक्ट  
इमेज सर्च तब की जाती है जब हम किसी रिपोर्ट या प्रेजेंटेशन के लिए कोई तस्वीर खोजते हैं। लेकिन यह तरीका सूचना खोजने में भी काम आ सकता है। अपनी काम की सूचना के लिए जब आपकी सर्च ग्राफ या चार्ट दिखाती है तो उससे आपको जरूरी सूचना का भी पता चल जाता है और आप इस कवायद में किसी सही सर्च पेज तक जा पहुंचते हैं। इसलिए जब आप अपनी रिपोर्ट, प्रजेंटेशन या ब्लॉग पोस्ट के लिए इमेज खोज रहे हों तो फ्लिकर का इस्तेमाल करें। गूगल पर कोई तस्वीर खोजते समय आप किसी भी तस्वीर के कॉपीराइट के बारे में दावे के साथ नहीं कह सकते। इसके विपरीत, यदि आप क्रिएटिव कॉमन्स लाइसेंसी तस्वीरों के लिए फ्लिकर का इस्तेमाल करते हैं तो वह कॉपीराइट की दृष्टि से सुरक्षित होंगी।
सवाल-जवाब
याहू पर सही सूचना मिलनी कई बार मुश्किल होती है और यही कारण है कि वह मुख्यधारा सर्च का हिस्सा नहीं बन सका है। लेकिन क्वोरा (www.quora.com) के साथ ऐसी समस्या नहीं होगी। इस साइट को विकि सिद्धांत पर तैयार किया गया है जिसमें इस्तेमालकर्ता को सवालों के जवाब देने, उनका संपादन करने, प्रश्नों में योगदान और जवाबों को श्रेणीगत लगाने की सुविधा है। प्रत्येक प्रश्न का अपना एक पृष्ठ है और यह उस सवाल का पुख्ता स्नोत साबित होता है। क्वोरा की खास बात ये है कि इसमें इसके फाउंडर्स, इंडस्ट्री लीडर और टॉपिक एक्सपर्ट सवालों के जवाब देते हैं। उदाहरण के लिए, यदि आप ट्विटर संबंधी कोई प्रश्न करते हैं तो बहुत संभव है कि उसके फाउंडर इवान विलियम्स जवाब दें। पेशेवराना राय के मामले में यह बेहतर है, लेकिन डिनर के लिए बाहर जा रहे हैं तो जाहिर है आप अपने परिवारजनों की ही राय लेंगे। इस जगह आर्डवार्क (http://vark.com) काम आता है। यह पूर्णतया नॉन-गूगल नहीं है, और चूंकि यह अभी नया है इसलिए गूगल का कुछ असर इस पर है। आर्डवार्क अपनी सर्च विधि से यह सुविधा देता है कि आपके सवालों का जवाब आपकी सोशल सर्च से जुड़े आपके मित्र या मित्रों के मित्र ही दें। यह भी सुविधा मिलती है कि जवाब सबसे बेहतर व्यक्ति दे और आपके सवाल किसी एक ही व्यक्ति के पास न जाएं।
खोज पक्ष
रियल टाइम और सोशल सर्च का मकसद आपके सवालों के जवाब की तलाश से अधिक नई खोज से है, और इसमें अभी कार्य चल रहा है। रियल टाइम सर्च में आपके सवालों के जवाब में सबसे हालिया लेख, लिंक और ब्लॉग सामने आते हैं। इस समय सबसे मशहूर रियल टाइम सर्च है (http://twitter.com/search)। लेकिन अन्य भी कुछ सेवाएं हैं जैसे वनरायट (www.oneriot.com) और गूगल और बिंग के सोशल सर्च फीचर। सोशल सर्च इसलिए भी कुछ अलग है कि इसमें आपके सोशल ग्राफ की पड़ताल पहले होती है।
फाइल तलाशें
कितनी ही बार हम किसी ऐसी रिपोर्ट, प्रस्तुतिकरण या डॉक्यूमेंट की खोज कर रहे होते हैं, जिसके बारे में हमें पता होता है कि वह नेट पर उपलब्ध है, पर वह नहीं मिलता। ऐसी स्थिति में स्लाइड शेयर (www.slideshare.net) स्क्रिब्ड (www.scribd.com) अथवा डॉकस्टॉक (www.docstoc.com) पर सर्च करना अधिक बेहतर विकल्प होगा। न सिर्फ यहां ये संभावना होगी कि आप अपनी जरूरत का डॉक्यूमेंट ढूंढ़ पाएंगे, पर उससे संबंधित दूसरे महत्वपूर्ण दस्तावेज भी तलाश सकेंगे, जिनके बारे में आप नहीं जानते थे।
वेब सर्च (विकल्प)
यहां वैकल्पिक शब्दों का प्रयोग इसलिए नहीं कहा, क्योंकि वेबसर्च के लिए यहां एक ही नाम बिंग (www.bing.com) का है। याहू का नाम भी इसमें शामिल किया जा सकता है, पर माइक्रोसॉफ्ट के साथ उसकी डील के बाद इसमें बहुत संभावना नहीं रही। फेस वेल्यू की बात करें तो गूगल और बिंग कुछ बहुत अलग परिणाम नहीं दर्शाएंगे। यहां यह बात भी ध्यान रखने योग्य है कि सर्च परिणाम आपके द्वारा की जा रही तलाश पर भी निर्भर करते हैं। कुछ के लिए जहां गूगल बेहतर है, तो अन्य के लिए बिंग बेहतर हो सकता है। परिणाम में इतना कम अंतर देखने को मिलता है कि नियमित यूजर को शायद ही कोई बड़ा फर्क इस संबंध में महसूस हो। बिंग के महत्व को इस बात से भी जाना जा सकता है कि गूगल ने अपनी सूचना वृद्धि के लिए बिंग यूजर इंटरफेस की सामग्री का अपने यहां इस्तेमाल किया।

क्या है आईआईपी? और क्यों है

औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) किसी अर्थव्यवस्था के औद्योगिक क्षेत्र में किसी खास अवधि में उत्पादन के हालात के
बारे में बताता है। भारत में हर महीने आईआईपी के आंकड़े जारी किए जाते हैं। ये आंकड़े आधार वर्ष के मुकाबले उत्पादन में बढ़ोतरी या कमी संकेत देते हैं। भारत में आईआईपी की तुलना के लिए वर्ष 1993-94 को आधार वर्ष माना गया है।

आईआईपी की गणना किस तरह से की जाती है?

किसी महीने की आईआईपी उस महीने के छह हफ्ते के अंदर जारी किया जाता है। आईआईपी के अनुमान के लिए 15 एजेंसियों से आंकड़े जुटाए जाते हैं। इनमें डिपार्टमेंट ऑफ इंडस्ट्रियल पॉलिसी एंड प्रमोशन (डीआईआईपी), इंडियन ब्यूरो ऑफ माइंस, सेंट्रल स्टैटिस्टिकल आगेर्नाइजेशन और सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी शामिल हैं। चूंकि यह जरूरी नहीं है कि किसी खास महीने का इंडेक्स तैयार करते समय उत्पादन से संबंधित सभी आंकड़े मौजूद हों, इसलिए पहले प्रोविजनल (अस्थाई) इंडेक्स तैयार करने के बाद जारी कर दिया जाता है। बाद के महीनों में इसमें दो बार संशोधन किया जाता है।

आईआईपी की शुरुआत कब हुई थी?

सबसे पहले 1937 को आधार वर्ष मानते हुई आईआईपी तैयार किया गया था। इसमें 15 उद्योगों को शामिल किया गया था। तब से अब तक इसमें कम से कम सात बार संशोधन किया जा चुका है। इंडेक्स को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए आधार वर्ष और इसमें शामिल उत्पादों में बदलाव किया गया है। सांख्यिकी मंत्रालय द्वारा जारी किए गए ताजा मानकों के मुताबिक किसी उत्पाद के इसमें शामिल किए जाने के लिए प्रमुख शर्त यह है कि वस्तु के उत्पादन के स्तर पर उसके उत्पादन का कुल मूल्य कम से कम 80 करोड़ रुपए होना चाहिए। इसके अलावा यह भी शर्त है कि वस्तु के उत्पादन के मासिक आंकड़े लगातार उपलब्ध होने चाहिए। इंडेक्स में शामिल वस्तुओं को तीन समूहों-माइनिंग, मैन्युफैक्चरिंग और इलेक्ट्रिसिटी में बांटा जाता है। फिर इन्हें उप-श्रेणियों मसल-बेसिक गुड्स, कैपिटल गुड्स, इंटरमीडिएट गुड्स, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स और कंज्यूमर नॉन-ड्यूरेबल्स में बांटा जाता है।

आईआईपी के आंकड़े अभी चर्चा में क्यों हैं?

इस साल अगस्त महीने के लिए जारी किए आईआईपी के आंकड़े चर्चा में हैं। इसकी वजह यह है कि इस साल अगस्त में औद्योगिक उत्पादन में 10.4 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। जुलाई में औद्योगिक उत्पादन में 7.2 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। असल में पिछले दो साल में अगस्त में औद्योगिक उत्पादन में सबसे अधिक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस बढ़ोतरी में कंज्यूमर ड्यूरेबल और कैपिटल गुड्स क्षेत्रों का बड़ा हाथ रहा है। कई जानकार इसका कारण सरकार के आथिर्क राहत पैकेज को बताते हैं। इससे चालू वित्त वर्ष के दौरान सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर अनुमानित 6 फीसदी से ज्यादा रह सकती है।

पास थ्रू सर्टिफिकेट (पीटीसी) क्या है?

पास थ्रू सर्टिफिकेट यानी पीटीसी वह प्रमाणपत्र है, जो गिरवी रखी गई संपत्ति के एवज में निवेशक को जारी किया जाता है। पीटीसी बैंक या अन्य वित्तीय संस्थानों द्वारा निवेशकों को जारी किए जाने वाले बॉन्ड या डिबेंचर के समान होते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पीटीसी को अंडरलाइंग सिक्योरिटीज के एवज में जारी किया जाता है। सिक्योरिटीज पर मिलने वाला ब्याज निवेशक को फिक्स्ड इनकम यानी निश्चित आय के रूप में होता है। प्राय: पीटीसी में वित्तीय संस्थाएं जैसे-बैंक, म्यूचुअल फंड् और बीमा कंपनियां निवेश करती हैं। हालांकि, इसे बेहतर ढंग से समझने के लिए हमें सिक्योराइटेजेशन के बारे में जानना होगा।
पास थ्रु सर्टिफ़िकेट का सीधा अर्थ है, कि जारीकर्ता कंपनी ने मूल-स्वामी से रकम प्राप्त कर निवेशक को पहुंचा दी है।


सिक्योराइटेजेशन क्या है?

बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थाएं ग्राहकों को जो लोन या सेवाएं देती हैं, उन पर उन्हें ब्याज मिलता है या मूलधन वापस मिलता है। सिक्योराइटेजेशन के तहत मिलने वाली रकम या आय को कर्ज योजनाओं (डेट इंस्ट्रूमेंट) में परिवर्तत कर निवेशकों को बेच दिया जाता है। इसके लिए मूल कंपनी या बैंक एक स्पेशल पर्पस व्हीकल (एसपीयू) बनाता है, जो डेट इंस्ट्रमेंट जारी करने का काम करती है। बाजार में इस डेट इंस्ट्रमेंट की बिक्री से मूल कंपनी को नकदी हासिल होती है। वह इस रकम या फंड का इस्तेमाल अपने कारोबार के लिए कर सकती है। जब कोई निवेशक इस डेट इंस्ट्रूमेंट को खरीदता है तो उसे पीटीसी जारी किया जाता है। इसका मतलब यह नहीं है कि पीटीसी के अंडरलाइंग एसेट पर निवेशक का अधिकार होता है। जब मूल कंपनी को दिए गए कर्ज की रकम या कर्ज पर ब्याज मिलता है तो वह उसे एसपीवी को स्थानांतरित कर देती है। एसपीवी इस रकम को फिक्स्ड इनकम के रूप में निवेशकों को दे देती हैं।

पास थ्रू सर्टिफिकेट और पे थ्रू सर्टिफिकेट में क्या अंतर है?

पास थ्रू सर्टिफिकेट में कंपनी को लोन पर मिलने वाला ब्याज या मूलधन सीधे निवेशक को दे दी जाती है, जबकि पे थ्रू सर्टिफिकेट में ब्याज या मूलधन की रकम निवेशक को नहीं दी जाती है। इसके बदले निवेशकों को एसपीवी द्वारा नई सिक्योरिटीज जारी की जाती है।

पीटीसी का क्या महत्व है? यह खबरों में क्यों है?

बाजार में मौजूद पीटीसी की रेटिंग क्रिसिल या फिच जैसी रेटिंग एजेंसियों द्वारा की जाती है। रेटिंग से निवेशकों को पीटीसी की अंडरलाइंग सिक्योरिटीज की गुणवत्ता के बारे में जानकारी मिलती है। वोकहार्ट द्वारा जारी पीटीसी की रेटिंग क्रिसिल ने घटा दी है। इसके चलते पीटीसी आजकल खबरों में है। वोकहार्ट अपने पीटीसी पर ब्याज का भुगतान करने में असमर्थ रही है, जिसके चलते उसके पीटीसी की रेटिंग घटा दी गई है।

इंटरनेट से ट्रांजेक्शन करते समय रहें सावधान कही आप अगले सिकार न बन जाये

आतंकवादियों के हाथों इंटरनेट के इस्तेमाल से जुड़ी घटनाओं ने यह साफ कर दिया है कि वेब दुनिया के यूजरों को हैकिंग और पहचान की चोरी जैसी धोखाधड़ी को लेकर सावधान रहने की जरूरत है। देश के शहरी इलाकों में - मेल और सर्फिंग के अलावा बिलों का भुगतान करने और धनराशि ट्रांसफर करने के लिए भी लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं। इंटरनेट पर वित्तीय लेन - देन में जरा सी चूक होने पर आपको बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है।

ऐसी धोखाधड़ी से बचने के लिए आपको आईटी का महारथी होने की जरूरत नहीं है , इसके लिए थोड़ी सूझ - बूझ ही काफी होगी। बिल डेस्क के निदेशक एम . एन श्रीनिवासु का कहना है , ' ज्यादातर ऑनलाइन फ्रॉड की जड़ें ऑफलाइन दुनिया में होती हैं। इंटरनेट पर सुरक्षित रहने के लिए भुगतान की ऑनलाइन सुविधाओं का पूरी सतर्कता के साथ इस्तेमाल करना चाहिए। '

उदाहरण के लिए ट्रांजैक्शन समाप्त करने पर नेट बैंकिंग खाते से लॉग आउट जरूर करें। यह तब और अहम हो जाता है , जब आप सार्वजनिक कंप्यूटर पर काम करते हों। इसके अलावा आप नीचे बताए जा रहे कुछ उपायों पर अमल कर भी सुरक्षित रह सकते हैं :

सुरक्षित पोर्टलों का इस्तेमाल करें :

ऑनलाइन भुगतान के लिए जिस साइट का इस्तेमाल किया जा रहा है , वह तकनीकी तौर पर सुरक्षित होनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं होगा तो आपके पासवर्ड और क्रेडिट कार्ड की जानकारी लीक हो सकती है। आपके आंकड़ों का इस्तेमाल कर फर्जी क्रेडिट कार्ड तैयार किया जा सकता है।

साइट का पता टाइप करते समय जरा सी गलती होने पर आप किसी ऐसी फर्जी साइट पर पहुंच सकते हैं , जो ऐसी ही गलतियों का लाभ उठाने के लिए तैयार की गई है। ट्रांजैक्शन से पहले यह देख लें कि आपने साइट का पता सही टाइप किया है।

लॉ फर्म सेठ असोसिएट्स में पार्टनर कर्णिका सेठ का कहना है , ' ऑनलाइन भुगतान करते समय ऐसे पोर्टलों का इस्तेमाल करना चाहिए , जिन पर विश्वास की ईसील हो और पेपल या सीसीएवेन्यू जैसे जांचे - परखे पेमेंट गेटवे का इस्तेमाल किया जाता हो

ग्रेच्युटी का फंडा

सैलरी स्लिप में एक राशि ग्रेच्युटी के तौर पर भी देखने को मिलती है। रिटायरमेंट अथवा संस्थान छोड़ते समय कर्मचारी को ग्रेच्युटी का भुगतान किया जाता है। हाल में ग्रेज्युटी की वर्तमान अधिकतम 3.5 लाख रुपये की सीमा को बढ़ाकर दस लाख करने की योजना है। यदि योजना पास हो जाती है तो कर्मचारियों को रिटायरमेंट के समय अधिक राशि मिलेगी।
किसी कंपनी में लगातार पांच साल या उससे अधिक काम करने के बाद ग्रेच्युटी के तौर पर एकमुश्त करमुक्त राशि कर्मचारी को मिलती है। सरकारी और गैरसरकारी दोनों संगठनों में ग्रेच्युटी दी जाती है। गैरसरकारी संगठन के कर्मचारी ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम 1972 के तहत आते हैं, जिसमें ऐसे नियुक्तिकर्त्ता जिनके पास पेरोल पर दस से अधिक कर्मचारी हैं, उन्हें अपने कर्मचारियों को रिटायरमेंट अथवा संस्थान छोड़ने की सिथति में ग्रेच्युटी देना अनिवार्य होगा।
सामान्यत: कर्मचारी ग्रेच्युटी की व्यवस्था एक फंड द्वारा करते हैं और मैनेजमेंट को किसी इंश्योरेंस या एक्चुरियल कंपनी को आउटसोर्स कर दिया जाता है। कुछ नियुक्तिकर्त्ता ग्रेच्युटी भुगतान को कॉस्ट टू कंपनी पैकेज के तहत दिखाते हैं, ऐसे में सीटीसी ऑफर में ग्रेच्युटी कटौती देखने को मिलती है क्योंकि नियुक्तिकर्त्ता द्वारा इसे अपने खर्च के तौर पर देखा जाता है।
अमूमन कंपनियों द्वारा बेसिक और महंगाई भत्ते के जोड़ का 4.81 प्रतिशत ग्रेच्युटी के तौर पर काटा जाता है। कुल मिलाकर रिटायरमेंट या संस्थान छोड़ते समय अंतिम माह के वेतन को 26 से भाग कर (चार रविवार छोड़) उसे 15 से गुणा करने पर जो राशि आएगी उसे जितने साल आपने संस्थान में काम किया है उससे गुणा करके ग्रेच्युटी की राशि प्राप्त करते हैं। फिलहाल ग्रेच्युटी बतौर मिलने वाली अधिकतम 3.5 लाख की राशि कर-मुक्त है। ऐसे में यदि नई योजना लागू हो जाती है, तो इसे कर के दायरे में लाने की संभावना है।
नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने अपने एक अहम फैसले में कहा है कि ग्रेच्युटी कर्मचारी का अधिकार है। प्रबंधन इस आधार पर इससे इनकार नहीं कर सकता कि कर्मी को भविष्य निधि और पेंशन का लाभ दिया जा रहा है।
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि कोई संस्थान किसी कर्मचारी को ग्रेच्युटी देने से इनकार नहीं कर सकता, क्योंकि संसद द्वारा पारित कानूनी प्रावधान को किसी अनुबंध या अन्य माध्यमों से नकारा नहीं जा सकता। न्यायमूर्ति बी. सुदर्शन रेड्डी और आर.एम. लोढा की खंडपीठ ने हालिया फैसले में कहा, 'जहां तक ग्रेच्युटी के भुगतान का सवाल है, संबंधित कानूनी प्रावधान अन्य किसी अनुबंध से ऊपर हैं। ग्रेच्युटी पाने के अधिकार को किसी अनुबंध या अन्य माध्यम से खत्म नहीं किया जा सकता।'
उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में इलाहाबाद बैंक की इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। उच्च न्यायालय ने बैंक प्रबंधन को सेवानिवृत्त कर्मचारी को ग्रेच्युटी देने का निर्देश दिया था। बैंक का तर्क था कि कर्मचारी को पेंशन और भविष्य निधि जैसे लाभ दिए गए इसलिए उसे ग्रेच्युटी नहीं दी जा सकती। अदालत ने कहा कि ग्रेच्युटी कुछ विशेष परिस्थितयों में ही रोकी जा सकती है और इसके लिए सरकार की मंजूरी लेनी होगी।

प्राइस अर्निंग क्या है

मूल्य-आय अनुपात का मतलब प्राइस अर्निंग(पीई ) अनुपात से है । यह दरअसल किसी भी शेयर का वैल्यूएशन जानने के लिए सबसे प्राथमिक स्तर का मानक है। दूसरे शब्दों में इसे इस तरह समझा जा सकता है कि यह अनुपात बताता है कि निवेशक किसी शेयर के लिए उसकी सालाना आय का कितना गुना खर्च करने के लिए तैयार हैं। सीधे शब्दों में किसी शेयर का पीई अनुपात दरअसल वर्षों की संख्या है, जिनमें शेयर का मूल्य लागत का दोगुना हो जाता है। जैसे अगर किसी शेयर का मूल्य किसी खास समय में 100 रुपए है और उसकी आय प्रति शेयर 5 रुपए है, तो इसका मतलब यह है कि उसका पीई अनुपात 20 होगा। यानी अगर सारी परिस्थितियां समान हों तो 100 रुपए के शेयर का दाम 20 साल में दोगुना हो जाएगा। यानी उस शेयर का पीई अनुपात उस खास समय में 20 है।

किसी कंपनी के वैल्यूएशन में पीई का क्या महत्व है?

पीई हमें केवल यह बताता है कि बाजार किसी शेयर पर कितना बुलिश या सकारात्मक है। पीई से अपने आप में कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। किसी भी नतीजे पर पहुंचने के लिए कुछ दूसरे पीई अनुपातों से इसकी तुलना जरूरी होती है। पहला, तो खुद उस कंपनी का पिछले 5-7 साल का ऐतिहासिक पीई। दूसरा, उसी के क्षेत्र में काम करने वाली दूसरी कंपनियों के पीई अनुपात और तीसरा, बेंचमार्क सूचकांक जैसे सेंसेक्स का पीई अनुपात। किसी कंपनी का पीई बहुत ज्यादा होने से दो निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। पहला, कंपनी को उसके सही मूल्य से बहुत ज्यादा भाव मिल रहा है और इसलिए शेयर महंगा है। दूसरा, बाजार को यह पता है कि आने वाले दिनों में इस कंपनी की वृद्घि दर काफी अधिक रहने वाली है और इसलिए उसके लिए ऊंचे भाव पर भी बोली लगाई जा रही है।
प्राइस अर्निंग आधारित परिसंपत्ति आवंटन से समय के साथ निवेशकों को मिल सकता है बेहतर प्रतिफल। आइए, इसे एक उदाहरण के माध्यम से समझते हैं।

सक्रिय निवेशक बेहतरीन शेयरों के चुनाव पर अधिक ध्यान देते हैं। इस दौरान कहीं न कहीं चूक भी हो सकती है। कारोबारी चक्र के कुछ चरणों में, एक वर्ग के रूप में इक्विटी का प्रदर्शन बुरा भी होता है।

वैसे निवेशक जो समय-समय पर विभिन्न परिसंपत्तियों में अपना आवंटन बदलते रहते हैं, उनका प्रदर्शन एक ही परिसंपत्ति वर्ग में निवेश करने वालों की तुलना में बेहतर होता है। परिसंपत्ति आवंटन की नीति स्वभाविक रूप से फंड ऑफ फंड की प्रक्रिया की ओर ले जाती है।

फंड ऑफ फंड के तहत म्युचुअल फंड पोर्टफोलियो को विभिन्न परिसंपत्ति वर्गों में निवेश किया जाता है। फ्रैंकलिन टेम्पलटन डायनामिक पीई रेश्यो फंड (एफटीडीपीई) फंड ऑफ फंड का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। एफटीडीपीई ने पिछले पांच वर्षों में 24 प्रतिशत की सालाना चक्रवृध्दि (सीएजीआर) के हिसाब से प्रतिफल दिया है जबकि निफ्टी ने 25 प्रतिशत सीएजीआर का प्रतिफल दिया है।

हालांकि, एफटीडीपीई का जोखिम समायोजित प्रतिफल अधिकांश विशुध्द इक्विटी फंडों की तुलना में काफी बेहतर रहा है। साल 2008 के दौरान जब बाजार मंदी के दौर से गुजर रहा था और जब निफ्टी में 55 प्रतिशत की गिरावट आई थी, तब एफटीडीपीई को हुआ अधिकतम घाटा 30.5 प्रतिशत का था। पिछले 12 महीनों में भी इसका प्रदर्शन जबरदस्त रहा है।

सालाना आधार पर जहां सूचकांक में 22 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई, वहीं एफटीडीपीई में 22.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई(इस वर्ग का प्रतिफल 19.2 प्रतिशत था)। एफओएफ की नीति यांत्रिक है। महीने के अंत के निफ्टी के पीई रेश्यो से इसका आवंटन जुड़ा हुआ है। अगर निफ्टी का पीई कम है तो परिसंपत्ति का 100 प्रतिशत तक इक्विटी में लगाया जा सकता है।

पीई रेश्यो बढ़ने की दशा में इक्विटी में निवेश को घटाया जाता है। अगर पीई अधिक होता है तो 100 प्रतिशत परिसंपत्तियों का निवेश ऋण में किया जा सकता है। एक सीमा यह है कि इक्विटी के तहत सभी निवेश फ्रैंकलिन इंडिया ब्लूचिप फंड में किए जाते हैं और ऋण में निवेश के लिए टेम्पलटन इंडिया इनकम फंड को चुना गया है।

इनमें से कोई फंड विशेष नहीं है। ये सभी अपने अपने वर्ग के अनुसार औसत प्रतिफल ही देते हैं। दूसरी बात यह है कि एक वर्ग के रूप में एफओएफ विशुध्द रूप से विशाखित इक्विटी फंडों की तुलना में यादा खर्चीले होते हैं। परिसंपत्ति आवंटन एक नीति की तरह काम करता है। इसकी वजह यह है कि ऐतिहासिक प्रतिफल मीन-प्रतिवर्ती और सामान्यतया वितरित होते हैं।

दीर्घावधि में शेयर बाजार का कारोबार ऐतिहासिक औसत पीई के आस पास होता है और इसका प्रतिफल भी ऐतिहासिक औसत प्रतिफल जैसा होता है। यह जानते हुए कि आम तौर पर वितरित आंकड़ों का व्यवहार कैसा है हम निवेश के कुछ उपयोगी तरीकों की भविष्यवाणी कर सकते हैं।

सितंबर 1999 से निफ्टी का सीएजीआर 13.5 प्रतिशत रहा है इसमें नकारात्मक और सकारात्मक दोनों ही अवधि शामिल हैं। 10 वर्षों का औसत पीई 17.6 प्रतिशत था जबकि मीडियन पीई 17.3 प्रतिशत और मोडल वैल्यू 14 से 15 के बीच रहा है। मानक विचलन 3.5 का था। समसन्य वितरण का नियम कहता है कि वक्त के 68 प्रतिशत में वैल्यूएशन 14 से 21 पीई के बीच रहेगा और 98 प्रतिशत वक्त में पीई 10 से 25 के बीच रहेगा।

इसके अनुसार अगर वैल्यूएशन कम होने पर निफ्टी का कारोबार किया जा रहा है तो इक्विटी में निवेश बढ़ाया जाना चाहिए और इसके विपरीत अगर निफ्टी का कारोबार अधिक वैल्यूएशन पर किया जा रहा है तो इक्विटी में निवेश घटाया जाना चाहिए। हर छह महीने पर एफटीडीपीई के परिसंपत्ति आवंटन का खुलासा किया जाता है।

मार्च 2008 में जब पीई 20.6 था तब इक्विटी में 50 प्रतिशत का आवंटन किया गया था। मार्च 2009 में जब पीई 14.3 प्रतिशत था तो लगभग 90 प्रतिशत परिसंपत्तियों का निवेश इक्विटी में किया गया था। यह माना जा सकता है कि सितंबर 2009 में पीई 22.6 प्रतिशत होने पर इक्विटी की अपेक्षा ऋण में निवेश बढ़ाया जा सकता है। एफटीडीपीई में निवेश करना बेहतर हो सकता है।

यह यांत्रिक पीई आधारित परिसंपत्ति आवंटन की नीति अपनाता है। कोई निवेशक चाहे तो एफटीडीपीई की ही भांति विभिन्न फंडों में अपनी परिसंपत्तियों का आवंटन कर सकता है। विशाखण के कई तरीके हैं।

उदाहरण के लिए, कोई निवेशक 3 या 5 बेहतर प्रदर्शन करने वाले विशाखित इक्विटी फंडों और इनकम फंडों में निवेश कर सकता है या फिर वह मिड-कैप फंडों पर विचार कर सकता है जो बाजार में तेजी के समय निफ्टी की तुलना में बेहतर प्रतिफल दे सकते हैं।

निवेशक चाहे तो करेंसी या कमोडिटी में भी निवेश कर विविधता ला सकता है। निश्चित ही इस प्रकार के प्रत्येक विशाखण में नया जोखिम समाहित होता है। एफटीडीपीई की नीति से यह स्पष्ट होता है कि इक्विटी में निवेश घटाने का वक्त आ गया है।

यह रुढ़िवादिता लगती है क्योंकि अर्थव्यवस्था में अभी सुधार होना शुरू ही हुआ है। लेकिन एक बात तो साफ हो गई है कि इक्विटी के मूल्य ऐतिहासिक रूप से अधिक हैं। अगर वर्तमान मूल्यांकन सही हैं तो अगले 6 से 12 महीने में आय में जबरदस्त बढ़ोतरी होनी चाहिए।


ट्रेलिंग पीई और अनुमानित पीई क्या हैं?

ट्रेलिंग पीई किसी शेयर की कीमत और पिछले 12 महीनों की उसकी आय के अनुपात को कहते हैं। इसी तरह अनुमानित पीई अगले 12 महीने की अनुमानित आय प्रति शेयर के आधार पर निकाला जाता है।

पीई से किसी शेयर की सही कीमत कैसे तय करें?

अक्सर किसी कंपनी के लिए सारी परिस्थितियां समान नहीं होतीं। कंपनी की आय हर साल या तो बढ़ती है या घटती है। इसके अलावा कंपनी अगर एफपीओ के जरिए नए शेयर बाजार में लाती है तो उससे शेयरों की कुल संख्या में भी बढ़ोतरी होती है। इन सभी का उसकी आय प्रति शेयर पर असर पड़ता है। अगर किसी कंपनी का ऐतिहासिक पीई पिछले पांच साल से 30 रहा हो और एकाएक बाजार की गिरावट के कारण वह 20 के पीई पर मिल रहा हो, तो वह शेयर सस्ता कहा जाएगा। लेकिन अगर वह कंपनी इंफोसिस हो जिसकी आय पर अमेरिका में संभावित मंदी के कारण असमंजस का माहौल बना हो, तो फिर एक नजर में आप 20 के पीई को सस्ता नहीं कह सकते।

देखिये स्मार्टफोन क्या है?

स्मार्टफोन एक प्रकार का मोबाइल फोन है जिसमें उच्चस्तरीय क्षमता, कंप्यूटर-जैसी कार्यप्रणाली मौजूद होती है. हालांकि स्मार्टफोन की उद्योग मान्य परिभाषा नहीं दी जा सकी है.कुछ लोगों के मुताबिक, स्मार्टफोन पूर्णत: ओपरेटिंग सिस्टम पर चलती है. जब अन्य लोग लोग इसे इसे ईमेल, इंटरनेट, ई-बुक रीडर जैसी सुविधाओं वाला फोन मानते हैं, जिसमें उच्च-स्तरीय की-बोर्ड होते हैं. दूसरे शब्दों में एक फोन जो छोटे कंप्यूटर जैसा कार्य करे..

आप जब भी मोबाइल खरीदने जाते होंगे तो स्मार्टफोन शब्द जरूर सुनते होंगे। दरअसल, स्मार्टफोन से मतलब उन फोन से हैं जो पूरी तरह से कंप्यूटर आधारित होते हैं और किसी ऑपरेटिंग सिस्टम जैसे विंडोज या किसी दूसरे ऑपरेटिंग सिस्टम से चलते हैं। इस फोन में ईमेल, इंटरनेट, ई-बुक रीडर, वाईफाई जैसी सुविधाएं मौजूद होती है, जो आज के आधुनिक युग में हर व्यक्ति की जरुरत बनती जा रही है। इस तरह के हैंडसेट्स में वे सभी आधुनिक सुविधाएं मौजूद होती हैं, जो एक कंप्यूटर में होती है। साधारण हैंडसेट में ये तकनीक नहीं होती है। इसके अलावा, स्मार्टफोन में ब्लूटूथ और इंफ्रारेड तकनीक भी इंस्टॉल होती है जिसकी मदद से कोई भी डाटा फ्री में ट्रांसफर किया जा सकता है। मौजूदा कंप्टीशन के दौर में स्मार्टफोन की चाहत दिनों दिन बढती जा रही है जिसके कारण कंपनियां रोज नए स्मार्टफोन बाजार में उतार रही है।